
औषधीय गुणों से भरपूर बिच्छू घास पहाड़ों में पोषण, स्वास्थ्य और स्वरोजगार का महत्वपूर्ण साधन बन सकती है।
बिच्छू घास/बिच्छू बूटी पहाड़ों में आम तौर पर उगने वाली वनस्पति है। पहले इसे बेकार जंगली घास माना जाता था, लेकिन इसके औषधीय गुणों, पोषण मूल्य और हर्बल उत्पादों में उपयोग के कारण यह स्थानीय लोगों के लिए आय का साधन बन सकती है।

उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल के अभिषेक घनसाला ने 'कसेरा' नाम की पहल के जरिए बिच्छू घास से हर्बल शैम्पू और साबुन बनाकर व्यवसाय खड़ा किया है। इसी तरह ग्राम तोली, लमगड़ा, अल्मोड़ा के किशन सिंह ने भी इसे आजीविका के रूप में अपनाना शुरू किया है।
स्थानीय घास को मूल्यवान हर्बल उत्पाद में बदलने की संभावना
महिलाओं और युवाओं के लिए रोजगार के अवसर
ऑनलाइन और ऑफलाइन बाजारों में उत्पादों की मांग
100ml हर्बल शैम्पू की कीमत लगभग रुपये 250 तक बताई जाती है
बिच्छू घास आयरन, विटामिन A, C और K से भरपूर होती है। पारंपरिक रूप से इसका उपयोग शरीर में हीमोग्लोबिन बढ़ाने, खून की कमी दूर करने, पाचन सुधारने और शरीर को डिटॉक्स करने में सहायक माना जाता है।
हीमोग्लोबिन बढ़ाने और खून की कमी में सहायक
जोड़ों के दर्द और गठिया में आराम देने में सहायक
पाचन क्रिया सुधारने में उपयोगी
एंटीऑक्सीडेंट्स के कारण इम्युनिटी और ऊर्जा बढ़ाने में सहायक
कैल्शियम, मैग्नीशियम और पोटेशियम के कारण हड्डियों के स्वास्थ्य में सहायक

इसके सेवन से शरीर को अंदरूनी गर्मी मिलती है। इसमें सूजनरोधी गुण माने जाते हैं, जो अर्थराइटिस और गठिया के दर्द से राहत देने में सहायक हो सकते हैं। फाइबर का अच्छा स्रोत होने के कारण इसकी सब्जी या काढ़ा कब्ज, गैस और पाचन संबंधी समस्याओं में उपयोगी माना जाता है।
पारंपरिक चिकित्सा में बिच्छू घास का उपयोग मौसमी एलर्जी और त्वचा संबंधी समस्याओं के लिए भी किया जाता रहा है। इसके पत्तों से सूप और हर्बल चाय बनाई जाती है, जिसे पोषक 'सुपरफूड' के रूप में भी देखा जा रहा है।
बिच्छू घास को कच्चा नहीं खाना चाहिए, क्योंकि इसके पत्तों में डंक मारने वाले छोटे-छोटे बाल होते हैं। इसे हमेशा पानी में उबालकर, सुखाकर या प्रोसेस करके ही इस्तेमाल करना चाहिए।
उबालकर सब्जी या साग के रूप में
सूप या काढ़े के रूप में
पत्तियों को सुखाकर हर्बल चाय के रूप में
प्रोसेस करके शैम्पू, साबुन, तेल या अर्क के रूप में
बिच्छू घास को सीधे छूने पर तेज जलन, लालिमा और खुजली हो सकती है। यह प्रभाव फार्मिक एसिड के कारण होता है। संवेदनशील त्वचा वाले लोगों में रैशेज या गंभीर एलर्जी भी हो सकती है।
ब्लड प्रेशर की दवा लेने वालों में बीपी बहुत कम हो सकता है
डायबिटीज की दवाओं के साथ ब्लड शुगर अचानक गिर सकता है
विटामिन K के कारण खून पतला करने वाली दवाओं के असर पर प्रभाव पड़ सकता है
अधिक सेवन से बार-बार पेशाब और डिहाइड्रेशन हो सकता है
गर्भवती महिलाओं को इसके सेवन से बचना चाहिए
औषधीय उपयोग के लिए इसका सेवन करने से पहले डॉक्टर या योग्य स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेना उचित है, खासकर यदि कोई दवा चल रही हो या पहले से स्वास्थ्य समस्या हो।
बिच्छू घास से बने हर्बल शैम्पू, साबुन, चायपत्ती, तेल और अर्क जैसे उत्पाद बाजार में जगह बना रहे हैं। लक्जरी होटल्स और कैफे में भी इसे पौष्टिक सुपरफूड के रूप में पहचान मिल रही है।
ग्रामीण क्षेत्रों में कंडाली का साग लंबे समय से खाया जाता रहा है
इसके पत्तों से सूप और हर्बल चाय बनाई जाती है
रेशों से मजबूत रस्सियां और बोरियां बनाई जा सकती हैं
बालों, त्वचा और आयुर्वेदिक उत्पादों में इसके अर्क का उपयोग हो रहा है
स्थानीय प्रसंस्करण से पहाड़ों में रोजगार बढ़ सकता है

बिच्छू घास पर कुछ संस्थाएं भी कार्य कर रही हैं। सतोली, नैनीताल स्थित आरोही संस्था के प्रयासों से बिच्छू घास की चायपत्ती तैयार की जा रही है और वर्तमान में इसे लगभग रुपये 200 प्रति किलो खरीदा जा रहा है। इस प्रयास से आसपास के लोगों को रोजगार मिलने के साथ उत्पाद को पहचान भी मिल रही है।
आईआईटी मंडी के शोधकर्ताओं ने बिच्छू घास के रेशे को कपास के साथ मिलाकर उच्च गुणवत्ता वाला फैब्रिक तैयार करने में सफलता पाई है। यह दिखाता है कि यह पौधा केवल खाद्य या औषधीय उपयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि टेक्सटाइल और प्राकृतिक फाइबर आधारित उद्योगों में भी उपयोगी हो सकता है।
बिच्छू घास, जिसे कभी डरावना और बेकार जंगली खरपतवार माना जाता था, सही प्रसंस्करण, प्रशिक्षण और बाजार से जुड़कर उत्तराखंड और हिमाचल जैसे हिमालयी राज्यों में आय और रोजगार का नया माध्यम बन सकती है।
नरेन्द्र सिंह बिष्ट हल्द्वानी से जुड़े लेखक हैं जो उत्तराखंड के ग्रामीण जीवन, कृषि, आजीविका और पहाड़ी संसाधनों पर लेखन करते हैं।
लेखक का उद्देश्य पहाड़ों की स्थानीय संभावनाओं, किसानों की चुनौतियों और ग्रामीण आजीविका से जुड़ी जानकारी को सरल भाषा में लोगों तक पहुंचाना है।