
बदलती जलवायु ने हर क्षेत्र में अपना प्रभाव डाला है वही पर्वतीय खेती में इसका दुष्प्रभाव देखने को मिल रहा है समय पर वर्षा का न होना अत्यधिक गर्मी के चलते फसल चक्र में परिवर्तन ने किसानो को खेती कार्य से विमुक्त किया पर संस्थाओं/सरकारी योजनाओं व युवाओं की स्वयं की दृढ़ इच्छा ने खेती में ऐसे बदलाव करवाए जिसके चलते आज खेती के साथ औषधीय पौधों की खेती समुदाय की आजीविका का साधन बन रही है।

रोजमेरी (Rosemary) एक सुगंधित, सदाबहार जड़ी-बूटी है जो अपने एंटीऑक्सीडेंट, एंटीइंफ्लेमेटरी और एंटीबैक्टीरियल गुणों के लिए अपनी अलग पहचान रखती है, पाचन में सुधार, स्मरण शक्ति बढ़ाने और तनाव कम करने में सहायक होती है। इसका उपयोग मुख्य रूप से मसालों के रूप में, अरोमाथेरेपी और बालों/त्वचा की देखभाल के लिए किया जाता है।

रोज़मेरी एक बहुमुखी जड़ी बूटी है जो मस्तिष्क के कार्य को बेहतर बनाकर हृदय को स्वस्थ रखती है और पाचन तंत्र को मजबूत बनाती है। अध्ययनों से इसकी याददाश्त बढ़ाने और चिंता कम करने में मदद की पुष्टि हुई है। यह बालों के विकास को भी बढ़ावा देती है।
रोजमेरी के तेल से मालिश करने से जोड़ों के दर्द, सूजन और मांसपेशियों के दर्द में आराम मिलता है, ताजी या सूखी पत्तियों का उपयोग सूप, सलाद, मीट और आलू के व्यंजनों में स्वाद और सुगंध बढ़ाने के लिए किया जाता है वही इसकी तेज खुशबू मच्छरों और छोटे कीड़ों को दूर रखती है।

रोजमेरी का उपयोग विभिन्न रूपों में किया जाता है - तेल, पाउडर, सूखी पत्तियाँ और ताजी पत्तियाँ। इसके औषधीय गुणों के कारण यह आयुर्वेद और होम्योपैथी में भी प्रयुक्त होती है।
पर एक बात जानना अत्यंत जरूरी है कि गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली माताओं को रोजमेरी का सेवन नहीं करवाया जाना चाहिए। रोजमेरी का अत्यधिक सेवन या उपयोग पेट में जलन, उल्टी, एलर्जी, त्वचा में जलन और गुर्दे को नुकसान पहुँचा सकता है साथ ही यह मिर्गी के मरीजों में दौरे को बढ़ा सकती है।
रोजमेरी के लिए अच्छी जल निकासी रेतीली या दोमट मिट्टी उपयुक्त मानी जाती है, मिट्टी का pH 6.0 से 7.0 के बीच होना चाहिए। रोजमेरी भूमध्यसागरीय पौधा है जिस कारण इसे सूखी, हल्की और पथरीली मिट्टी पसंद है, जिसमें पानी जमा न हो। इसके लिए अधिक जगह की आवश्यकता भी नहीं होती पर्वतीय क्षेत्रों में काश्तकार अपनी खेती के साथ लघु रूप में इस कार्य को कर रहे है।

ग्राम सतोली, रामगढ़, नैनीताल में आरोही संस्था द्वारा रोजमेरी के लाभों को जानते हुए नजदीकी 10 ग्रामों के 20 लाभार्थियों के साथ इस कार्य को प्रारंभ किया जिसमें उनको रोजमेरी के पौध उपलब्ध कराए गए साथ ही तकनीकी प्रशिक्षण से कौशल विकास प्रदान किया गया।

वर्तमान समय में रोजमेरी के पौधों को काश्तकारों से खरीदा जा रहा है। संस्था की आजीविका यूनिट में रोजमेरी के विभिन्न उत्पाद बनाकर राज्य, राष्ट्रीय के साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बेचा जा रहा है जिससे पर्वतीय उत्पादों को पहचान मिल रही है।
इस कार्य से समुदाय को नजदीकी स्तर पर रोजगार मुहैया होने से पलायन में कमी देखने को मिल रही है। वर्तमान में यह प्रयास अन्य ग्रामों के 50 प्रत्यक्ष व 70 लाभार्थियों को अपत्यक्ष रूप से लाभ मिल रहा है।
संस्था के सकारात्मक पहल के चलते काश्तकारों से प्रति वर्ष 250 किलो सूखी रोजमेरी व 400 किलो कच्ची रोजमेरी क्रय की जा रही है जिससे काश्तकारों की रुपए 1.5 से 2.0 लाख की आय सृजन हो रही है।
पर्वतीय क्षेत्रों में परंपरागत खेती के साथ औषधीय पौधों की खेती सफल उदाहरण बन रही है इसलिए सरकार का यह प्रयास होना चाहिए कि इसको अधिक से अधिक प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
रोजमेरी जैसी जड़ी-बूटियों की खेती न केवल किसानों की आय बढ़ाने में मदद करती है बल्कि पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास लक्ष्यों की प्राप्ति में भी योगदान देती है।
हल्द्वानी, नैनीताल
नरेन्द्र सिंह बिष्ट उत्तराखंड के सामाजिक, पर्यावरणीय और ग्रामीण विकास से जुड़े विषयों पर लेखन और रिपोर्टिंग करते हैं।